भारत विविधता में एकता वाला देश हैं। हमारे देश के अंदर अलग अलग धर्म के संप्रदाय के लोग रहते हैं। सभी लोग अपने अपने धार्मिक रीति रिवाजों का सम्मान करते हैं। भारत के अंदर आपको हर 1 किलोमीटर के अंदर ईश्वर का कोई छोटा या बड़ा मंदिर मिल जायेगा। देश के अंदर रहने वाले सभी लोग अपनी इशभक्ति में लीन रहते हैं।
सनातन धर्म के हिंदू धर्म के अनुयाई भगवान की पूजा अर्चना अलग अलग रूप में अलग अलग जगह करते हैं।
दक्षिण भारत में भगवान तिरुपति की पूजा बहुत धूम धाम से की जाती हैं। तिरुपति बालाजी की ख्याति पूरे विश्व में फैली हुई हैं। इनको मानने वाले संसार के हर कोने में रहते हैं।
Who Is Khatushyam ji??
उत्तर भारत मे खाटूश्याम जी की मान्यता बहुत ज्यादा हैं। खाटूश्याम जी की पूजा भारत में राजस्थान हरियाणा सहित उत्तर भारत के लगभग कई राज्यों में की जाती हैं। इनको मानने वाले भक्त इन्हे “हारे का सहारा” कहते हैं।
जिसका मतलब होता हैं “कमजोर का सहायक”।
भगवान खाटूश्याम जी के बारे में मान्यता हैं की ये है दुखिः और कमजोर आदमी की पुकार जरूर सुनते हैं और उसकी सहायता करते हैं।
इनके बारे में आपको हजारों सच्ची कहानियां इनके भक्तो से सुनने को मिल जायेगी। इनकी शक्ति के कई नमूनों के साक्षी आपको अब भी मिल जायेंगे। इनको मानने वाले भक्तो का कहना हैं की अगर भगवान खाटूश्याम जी को मन से याद किया जाए तो ये भक्त की पुकार अवश्य सुनते हैं। अपने भक्तो की सहायता उन्होंने कई बार साक्षात आकर भी की हैं।
Kya Khatushyam ji Bhagwan Krishna ke Avtaar hain??
खाटूश्याम जी को मानने वाले कई भक्तो का मानना हैं की ये भगवान श्री कृष्ण के ही अवतार हैं जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग हैं।
आज हम आपको बताने जा रहे हैं बाबा खाटू नरेश के जीवन के बारे में की आखिर ये थे कोन??
इनको भगवान मान कर पूजा करना लोगो ने केसे शुरू कर दिया??
Khatu Shyam Ji Ka Janm Kab Hua Tha??
खाटू श्याम जी महाभारत काल में जन्मे थे यह द्वापर युग के एक बहुत बड़े योद्धा थे, जिनके सामने बड़े-बड़े योद्धा हार मान लेते थे। इनको किसी कमजोर की सहायता करना इनकी गुरु और माता ने सिखाया था।
खाटू श्याम जी का मानना था की अगर कोई कमजोर हैं, चाहे वह कोई भी हो अधर्मी या धर्मी, अगर वो कमजोर हैं तो ये उसकी सहायता अवश्य करेंगे। द्वापर के अंदर कलियुग कितने अधार्मिक लोग भी नही थे केवल कुछ अधर्मियो को छोर दे तो।
खाटूश्याम जी का असली नाम बर्बरीक था। महाभारत में अति बलशाली भीम के यह पोते थे। भीम के पुत्र घटोत्कच कि ये संतान थे।
महाभारत काल की बात है। जब कौरवों और पांडवों के मध्य युद्ध शुरू होने के आसार नजर आने लगे थे। कौरव और पांडवों के बीच में युद्ध होना जब निश्चित हो चुका था। उस समय दोनों पक्ष अपने समर्थकों को युद्ध के लिए आमंत्रित कर रहे थे। देश विदेश से राजा महाराजा इस संसार के सबसे बड़े युद्ध में भाग लेने के लिए कुरुक्षेत्र की धरती पर आ रहे थे। जब घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को महाभारत के युद्ध के बारे में पता चला तो उन्होंने भी इस युद्ध के अंदर भाग लेने का सोचा।
एक दिन अपनी माता से आज्ञा लेकर बर्बरीक भी पांडवों के युद्ध शिविर में आ गए थे। बर्बरीक ने भी इस युद्ध के अंदर भाग लेने की इच्छा व्यक्त की। भगवान कृष्ण को जब इनके बारे में पता चला तो वे थोड़ा चिंतित हो गए।
Khatushyam Ji Kese Bhagwan Bane??
भगवान श्री कृष्ण अंतर्यामी थे इसलिए वह बर्बरीक को कमजोर पक्ष की सहायता करने के प्रण के बारे में जानते थे। श्री कृष्ण जी ये भलीभांति जानते थे की अगर युद्ध में कभी कोई ऐसी स्थिति आई जहां पांडव पक्ष मजबूत हो और कौरव पक्ष कमजोर हो जाए🤔🤔
उस समय के ऊपर बर्बरीक कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ेगा और अगर बर्बरीक ने युद्ध लड़ा तो पांडवों की हार निश्चित है।
भगवान श्री कृष्ण गहन सोच के अंदर पड़ गए की आखिर इस विपदा का क्या निवारण किया जाए🤔🤔
भगवान श्री कृष्ण बहुत ही चतुर थे उन्होंने अपनी बुद्धि से इस समस्या का भी उन्होंने एक उपाय ढूंढ़ निकाला।
बर्बरीक एक महाबली योद्धा होने के साथ-साथ बहुत बड़ा दानी भी था। बर्बरीक का मानना था की दान करना बहुत ही पुण्य का काम हैं और में अगर सक्षम हूं किसी को दान देने के लिए तो मुझे अवश्य देना चाहिए दान।
एक बार जब वह सुबह नित्य कर्म से निवृत्त होकर सूर्य दर्शन करके अपने महल वापस जा रहा था, उसी समय पर भगवान श्री कृष्ण से उसकी मुलाकात हुई।
भगवान श्री कृष्ण ने बातों ही बातों में बर्बरीक से जानने की कोशिश की कि उसकी धनुर्विद्या में ऐसा अनोखा क्या है जिससे वह शत्रु सेना को धराशाई कर सकता है🤔🤔
बर्बरीक ने अपनी दिव्य शक्तियों के बारे में भगवान श्री कृष्ण जी को विस्तार से बताया और भगवान श्री कृष्ण से कहा कि वह इस युद्ध को केवल तीन ही बाणों से समाप्त कर सकता है।
जब श्री कृष्ण जी ने उससे पूछा कि मात्र तीन बाणों से केसे🤔🤔
बर्बरीक ने बताया कि एक बाण से वह अपने पक्ष के योद्धाओं को एक सुरक्षा चक्र के अंदर सुरक्षित कर देगा।
दूसरे बाण से वह सभी शत्रु योद्धाओं को चिन्हित करेगा और तीसरे बाण से वह सभी शत्रु योद्धाओं को मार डालेगा।
Bhagwan shri krishn ji ne Khatushyam ji se daan me kya manga??
भगवान श्री कृष्ण ने उससे कहा कि मैं यह बात कैसे मानूं, की तुम जो कह रहे हो वह सत्य हैं??
तुम मुझे करके दिखाओ तो मैं यह बात मान सकता हूं तब बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण को कहा कि मैं आपके ऊपर तीर नहीं चला सकता।
इस सारी वार्ता के मध्य भगवान श्री कृष्ण ने उसे एक सुझाव दिया कि पास ही में एक पुराना बरगद का पेड़ हैं, तुम उसके पत्तों को अपने बाणों से छेद कर बताओ।
श्री कृष्ण जी और बर्बरीक दोनों अब उस पेड़ के पास आ चुके थे। बर्बरीक ने बाण चलाने से पहले अपने धनुष बाण को प्रणाम किया और पहले बाण से उसने उसे वटवृक्ष पर बैठे हुए सभी पशु पक्षियों को सुरक्षित कर दिया।
बर्बरीक ने अपने दूसरे बाण से उसने सभी पत्तों को चिन्हित किया और तीसरा बाण छोड़ते ही उसके धनुष से निकले हुए तीर वटवृक्ष के उन पत्तों का छेदन करने लगे जिन पर किसी पशु पक्षी का घर नहीं था।
उनके धनुष से निकले हुए बाण हर एक उस पत्ते को छेदने लग गए थे जिसे बर्बरीक ने दूसरे बाण से चिन्हित किया था। बर्बरीक के बाण से निकला हुआ एक तीर भगवान श्री कृष्ण के पैर में जाकर लगा।
बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण से इसके लिए क्षमा मांगी।
इस पर श्री कृष्ण बर्बरीक से कहने लगे, “इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है एक पत्ता मैंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था और तुम्हारा बाण उसी पत्ते का छेदन करने के लिए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ा जा रहा था।
श्री कृष्ण बर्बरीक से कहने लगे पुत्र तुम्हारी धनुर्विद्या बहुत ही उत्तम है और तुम एक महाबली योद्धा हो जो शत्रु को युद्ध के मैदान में धूल चटा सकता हैं।
Kya Khatushyam ji ne Mahabharat Ka pura yuddh dekha tha??
ऐसे ही कुछ दिन बीत गए और महाभारत का युद्ध शुरू होने की तिथि नजदीक आने लगी थी तो एक दिन भगवान श्री कृष्ण एक ब्राह्मण का वेश धर कर सुबह सुबह बर्बरीक से भिक्षा मांगने के लिए चले गए।
बर्बरीक उस समय सूर्य दर्शन करके लौट रहा था और रास्ते में भिक्षा मांगते हुए ब्राह्मण को देख कर रुक गया।
ब्राह्मण रूपी भगवान श्री कृष्ण बर्बरीक से भिक्षा मांगने लगे। उसके पास उस समय कुछ देने के लिए नहीं था।
एक ब्राह्मण को भिक्षा दिए बिना लौटाना उसके स्वभाव में नहीं था। बर्बरीक ने ब्राह्मण देवता से कहा कि “हे ब्राह्मण देवता आप मुझसे दीक्षा में क्या चाहते हैं” आप मुझे आदेश दीजिए जो मेरे वस में होगा वह दान देने का प्रयत्न में आपको अवश्य करूंगा।
भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सर ही भिक्षा में मांग लिया।
बर्बरीक जानता था कि ब्राह्मण के वेश में खुद त्रिलोकी के नाथ भगवान श्री कृष्ण जी हैं और अगर ईश्वर को मुझसे कुछ दान चाहिए तो में बहुत बड़ा सौभाग्यशाली हूं।
बर्बरीक ब्राह्मण देवता से बोले कि “हे ब्राह्मण देव मैं जानता हूं कि आप साक्षात भगवान श्रीकृष्ण हो और आप नहीं चाहते कि मैं इस युद्ध के अंदर भाग लूं ।इसीलिए आप मेरा सर दान के अंदर मांगने आए हो परंतु मैं आपको मना नहीं करूंगा”
बर्बरीक ने अपना सर काट कर भगवान श्री कृष्ण के हाथों में दे दिया। आज के समय में ऐसा कोई दानी नही मिलेगा जो अपना सर काट कर दान मांगने वाले के हाथो में खुद रख दे।
भगवान श्री कृष्ण बर्बरीक की दानवीरता से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने साक्षात रूप में बर्बरीक को दर्शन दे कर उससे कोई वरदान मांगने को कहा।
बर्बरीक ने श्री कृष्ण जी से वरदान में मांगा की वह महाभारत के युद्ध को अपनी आंखो से देखे। भगवान श्री कृष्ण उसकी बात सुन कर उसे हां कर दी और बर्बरीक के कटे हुए सर को कुरुक्षेत्र के पास ही की एक पहाड़ी के ऊपर एक पेड़ के ऊपर अपने सुदर्शन चक्र के माध्यम से स्थापित कर दिया ताकि उस पहाड़ी के ऊपर विद्यमान होकर वह महाभारत का सम्पूर्ण युद्ध देख सके।
महाभारत का युद्ध शुरू हुआ और इतिहास की सबसे भयानक त्रासदी शुरू हो गई। कुरुक्षेत्र की धरती पर लाशे ही लाशे बिखरी पड़ी थी। किसी जगह पर सैनिकों के कटे हुए अंग पड़े थे तो कहीं पर कोई युद्ध में भाग लेने वाले जानवर घायल पड़े थे। इस युद्ध का असर केवल भारतवर्ष ही नही बल्कि पूरे संसार में हुआ। महाशक्तियों और दिव्य हथियारों से हुए युद्ध में कई देश बर्बाद हो गए।
महाभारत युद्ध में द्वापर युग के सभी महारथी धराशाही होने लगे। पितामह भीष्म, महारथी कर्ण, दुर्योधन जैसे महा योद्धा एक एक कर के वीरगति को प्राप्त हुए।
महाभारत का युद्ध अब लगभग समाप्त हो चुका था। पांडव पक्ष ने महाभारत के युद्ध में विजय प्राप्त की थी।
महाभारत के युद्ध के बाद पांडव भाईयो में थोड़ा अभिमनआ गया था की उन्होंने इतने वीर योद्धाओं से भरी कौरवों की सेना को परास्त कर दिया।
भीम कहते थे की सबसे ज्यादा युद्ध में शत्रु को उन्होंने मारा हैं तो अर्जुन को अपने गांडीव पर अभिमान हो गया था।
जब सारे पांडव अपने बारे में कोई सही निर्णय नहीं ले पाए की आखिर इस युद्ध में किस योद्धा ने ज्यादा वीरता का उदाहरण पेश किया तो वे इसके निस्कृष के लिए भगवान श्री कृष्ण के पास गए और इस पर फैसला करने की अपील उनसे की,
भगवान श्री कृष्ण पांडवों से बोले की इस युद्ध का असली परिणाम तो वही इंसान बता सकता हैं जिसने ये सम्पूर्ण युद्ध अपनी आंखो से देखा हो और निष्पक्ष रूप से निर्णय दी सके।
भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों से कहा कि वो एसे एक व्यक्ति को जानते हैं जिसने सम्पूर्ण महाभारत के युद्ध को अपनी आंखो से देखा हैं और वो फैसला निष्पक्ष देंगे।
पांडव श्री कृष्ण जी के साथ कुरुक्षेत्र की उसे पहाड़ी पर जाने लगे जहां पर बर्बरीक का कटा हुआ सर स्थापित था।
बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण और सभी पांडव भाईयो को प्रणाम किया और उनसे आने का कारण जाना🤔🤔
जब पांडवों में उन्होंने अपनी समस्या बताई तो बर्बरीक बोले इसका निर्णय तो बहुत ही आसान हैं।
Barbrik se Khatushyam Kese Bane??
मेने अपनी आंखो से इस महायुद्ध को देखा हैं और में अपने आपको बहुत भाग्यशाली मानता हूं कि श्री कृष्ण जी ने मुझे वो दिव्य शक्ति दी जिससे में इस संपूर्ण युद्ध और इसके विनाश को देख सका।
बर्बरीक बोले,
“जिस बाण से पितामह भीष्म धराशाही होकर धरती पर गिर थे उस बाण के अगले सिरे पर सुदर्शन चक्र था, जिस गदा के प्रहार से दुर्योधन आहत हुआ उसे गदा के आगे भी भगवान श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र था।
इस युद्ध के अंदर केवल एक ही हथियार चला था और वो था सुदर्शन चक्र,
सभी कौरवों की सेना का नाश करने वाला भी सुदर्शन चक्र ही था”।
पांडवों का अभिमान ये सुनकर टूट गया था, क्योंकि वो अपने आपको इस महाभारत का विजेता समझ रहे थे परंतु असली विजेता तो भगवान श्री कृष्ण ही थे।
बर्बरीक की भक्ति से भगवान श्री कृष्ण बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया की वे कलियुग के अंत तक इस धरती पर साक्षात निवास करेंगे और उन्हें भगवान श्री कृष्ण के ही एक नाम श्याम से जाना जाएगा।
जो भी सच्चे मन से भगवान खाटूश्याम जी से कुछ मांगेगा उनकी पूर्ति अवश्य भगवान खाटू श्याम पूरी करेंगे।
राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गांव मे इनका मंदिर हैं। जिसकी मान्यता पूरे संसार में विख्यात हैं।
इनको मानने वाले उनके अनुयाई हर साल इनकी दर पर जाते हैं और उन्हें प्रणाम कर के आते हैं।
आज भी खाटूश्याम जी इस धरती पर विचरण करते है और अपने भक्तो की सभी मनोकामना पूरी करते हैं।
बोलो खाटूश्याम जी महाराज की जय🙏🙏
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